शुक्रवार, 6 मई 2016

नि: स्काम भक्ति


♻ एक भक्त था, वह रोज बिहारी जी के मंदिर जाता था। पर मंदिर में बिहारी जी की जगह उसे एक ज्योति दिखाई देती थी, मंदिर में बाकी के सभी भक्त कहते- वाह ! आज बिहारी जी का श्रंगार कितना अच्छा है,, बिहारी जी का मुकुट ऐसा,, उनकी पोशाक ऐसी,, तो वह भक्त सोचता... बिहारी जी सबको दर्शन देते है, पर मुझे क्यों केवल एक ज्योति दिखायी देती है । हर दिन ऐसा होता । एक दिन बिहारी जी से बोला ऐसी क्या बात है की आप सबको तो दर्शन देते है पर मुझे दिखायी नहीं देते । कल आप को मुझे दर्शन देना ही पड़ेगा.अगले दिन मंदिर गया फिर बिहारी जी उसे जोत के रूप में दिखे । वह बोला बिहारी जी अगर कल मुझे आपने दर्शन नहीं दिये तो में यमुना जी में डूबकर मर जाँऊगा ।
♻ उसी रात में बिहारी जी एक कोड़ी के सपने में आये जो कि मंदिर के रास्ते में बैठा रहता था, और बोले तुम्हे अपना कोड़ ठीक करना है वह कोड़ी बोला - हाँ भगवान, भगवान बोले - तो सुबह मंदिर के रास्ते से एक भक्त निकलेगा तुम उसके चरण पकड़ लेना औरतब तक मत छोड़ना जब तक वह ये न कह दे कि बिहारी जी तुम्हारा कोड़ ठीक करे .अगले दिन वह कोड़ी रास्ते में बैठ गया जैसे ही वह भक्त निकला उसने चरण पकड़ लिए और बोला पहले आप कहो कि मेरा कोड़ ठीक हो जाये ।
♻ वह भक्त बोला मेरे कहने से क्या होगा आप मेरे पैर छोड दीजिये ,कोड़ी बोला जब तक आप ये नहीं कह देते की बिहारी जी तुम्हारा कोड़ ठीक करे तक मैं आपके चरण नहीं छोडूगा. भक्त वैसे ही चिंता में था,कि बिहारी जी दर्शन नहीं दे रहे,ऊपर से ये कोड़ी पीछे पड़ गया तो वह झुँझलाकर बोला जाओ बिहारी जी तुम्हारा कोड ठीक करे और मंदिर चला गया,मंदिर जाकर क्या देखता है बिहारीजी के दर्शन हो रहे है,बिहारेजी से पूछँने लगा अब तक आप मुझे दर्शन क्यों नहीं दे रहे थे,तो बिहारीजी बोले तुम मेरे निष्काम भक्त हो आज तक तुमने मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा इसलिए में क्या मुँह लेकर तुम्हे दर्शन देता यहाँ सभी भक्त कुछ न कुछ माँगते रहते है इसलिए में उनसे नज़रे मिला सकता हूँ ,पर आज तुमने रास्ते में उस कोड़ी से कहा - कि बिहारी जी तुम्हारा कोड़ ठीक कर दे इसलिए में तुम्हे दर्शन देने आ गया ।
♻सार - भगवान की निष्काम भक्ति ही करनी चाहिये,भगवान की भक्ति करके यदि संसार के ही भोग,सुख ही माँगे तो फिर वह भक्ति नहीं वह तो सोदेबाजी है!
2  जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं
एक बार एक नवयुवक किसी संत के पास पहुंचा और बोला :
“ महात्मा जी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं...
संत बोले, “पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो ” युवक ने ऐसा ही किया...
“इसका स्वाद कैसा लगा ?”, संत ने पुछा...?
“बहुत ही खराब … एकदम खारा .” – युवक थूकते हुए बोला .
संत मुस्कुराते हुए बोले , “एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक लेलो और मेरे पीछे -पीछे आओ.. “दोनों धीरे -धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए ...
चलो, अब इस नमक को पानी में दाल दो .”, संत ने निर्देश दिया।
युवक ने ऐसा ही किया...
“अब इस झील का पानी पियो .” , संत बोले...
युवक पानी पीने लगा …,
एक बार फिर संत ने पूछा ,: “ बताओ इसका स्वाद कैसा है , क्या अभी भी तुम्हे ये खरा लग रहा है...?”
“नहीं , ये तो मीठा है , बहुत अच्छा है ”, युवक बोला....
संत युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले , “ जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं ; न इससे कम ना ज्यादा . जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है , बिलकुल वही . लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं . इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो… ग़्लास मत बने रहो झील बन जाओ .”॥sri sri ||
जन्म लिया है तो सिर्फ साँसे मत लीजिये,
जीने का शौक भी रखिये..
1 संत भी भगवान राम को अपना शिष्य मानते थे
एक संत थे वे भगवान राम को मानते थे कहते है यदि भगवान से निकट आना है तो उनसे कोई रिश्ता जोड़ लो.जहाँ जीवन में कमी है वही ठाकुर जी को बैठा दो, वे जरुर उस सम्बन्ध को निभायेगे, इसी तरह संत भी भगवान राम को अपना शिष्य मानते थे और शिष्य पुत्र के समान होता है इसलिए माता सीता को पुत्र वधु (बहू)के रूप में देखते थे. उनका नियम था रोज मंदिर जाते और अपनी पहनी माला भगवान को पहनाते थे पर उनकी यह बात मंदिर के लोगो को अच्छी नहीं लगती थी उन्होंने पुजारी से कहा - ये बाबा रोज मंदिर आते है और भगवान को अपनी उतारी हुई माला पहनाते है,कोई तो बाजार से खरीदकर भगवान को पहनाता है और ये अपनी पहनी हुई भगवान को पहनाते है. पुजारी जी को सबने भडकाया कि बाबा की माला आज भगवान को मत पहनाना,अब जैसे ही बाबा मंदिर आये और पुजारी जी को माला उतार कर दी,तो आज पुजारी जी ने माला भगवान को पहनाने से इंकार कर दिया. और कहा यदि आपको माला पहनानी है तो बाजार से नाई माला लेकर आये ये पहनी हुई माला ठाकुर जी को नहीं पह्नायेगे.वे बाजार गए और नई माला लेकर आये, आज संत मन में बड़े उदास थे, अब जैसे ही पुजारी जी ने वह नई माला भगवान श्री राम को पहनाई तुरंत वह माला टूट कर नीचे गिर गई ,उन्होंने फिर जोड़कर पहनाई, फिर टूटकर गिर पड़ी, ऐसा तीन-चार बार किया पर भगवान ने वह माला स्वीकार नहीं की. तब पुजारी जी समझ गए कि मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है.और पुजारी जी ने बाबा से क्षमा माँगी. संत सीता जी को बहू मानते थे इसलिए जब भी मंदिर जाते पुजारी जी सीता जी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते थे, भाव ये होता था कि बहू ससुर के सामने सीधे कैसे आये, और बाबा केवल राम जी का ही दर्शन करते थे जब भी बाबा मंदिर आते तो बाहर से ही आवाज लगाते पुजारी जी हम आ गए और पुजारी जी झट से सीता जी के आगे पर्दा कर देते.एक दिन बाबा ने बाहर से आवाज लगायी पुजारी जी हम आ गए, उस समय पुजारी जी किसी दूसरे काम में लगे हुए थे, उन्होंने सुना नहीं, तब सीता जी ने तुरत अपने विग्रह से बाहर आई और अपने आगे पर्दा कर दिया.जब बाबा मंदिर में आये, और पुजारी ने उन्हें देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ और सीता जी के विग्रह की ओर देखा तो पर्दा लगा है. पुजारी बोले - बाबा! आज आपने आवाज तो लगायी ही नहीं ? बाबा बोले - पुजारी जी! मै तो रोज की तरह आवाज लगाने के बाद ही मंदिर में आया.तब बाबा समझ गए कि सीता जी ने स्वयं कि आसन छोड़कर आई और उन्हें मेरे लिए इतना कष्ट उठना पड़ा.आज से हम मंदिर में प्रवेश ही नही करेंगे.अब बाबा रोज मंदिर के सामने से निकलते और बाहर से ही आवाज लगाते अरे चेला राम तुम्हे आशीर्वाद है सुखी रहो और चले जाते.सच है भक्त का भाव ठाकुर जी रखते है और उसे निभाते भी है. चलो मन वृन्दावन की ओर प्रेम का रस जहाँ छलके है,
कृष्णा नाम से भोर.... भक्ति की रीत जहाँ पल पल है, प्रेम प्रीति की डोर..... राधे राधे!! जपते जपते , दिख जाए चितचोर ..... चलो मन वृन्दावन की ओर !!!
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ये है राम नाम की महिमा जो जन्म जन्मांतर तक रहती है साथ
Tue, 07 Jul 2015 12:13 PM (IST)
भक्त और भगवान के बीच श्रद्धा को चित्रित करती यह कथा अमूमन हिंदू पौराणिक ग्रंथों में मिल जाएगी। कथा के अनुसार अयोध्या में एक निम्न जाति का व्यक्ति रहता था।
उसके पास कुछ धन था, इसलिए वह घमंडी हो गया। लेकिन उसका धन समय के साथ खत्म हो गया। इसलिए वह रोजगार की तलाश में अयोध्या से उज्जैन पहुंच गया।
यहां उसके जीवन-यापन करने की समस्या से छुटकारा मिल गया। उज्जैन में ही उसकी मुलाकात वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण से हुई। वह भी शिव भक्त था। लेकिन वह उस व्यक्ति की तरह देवताओं की निंदा नहीं करता था। एक दिन ब्राह्मण ने उस व्यक्ति को एक शिवपूजन की विधि बताई। लेकिन उस व्यक्ति को बात समझ नहीं आई।
ब्राह्मण जानता था कि वह व्यक्ति धर्म-कर्म और भगवान में कोई रुचि नहीं रखता है। लेकिन वह भगवान के प्रति अच्छे भाव नहीं रखता था। एक समय की बात है।
वह व्यक्ति शिव मंदिर में शिवजी का नाम जप रहा था। तभी किसी कारण से गुरुदेव वहां पहुंचे। उस व्यक्ति ने उन्हें देखा लेकिन उसने घमंड के कारण उन्हें प्रणाम तक नहीं किया। लेकिन गुरुदेव अत्यंत दयालु थे। शिष्ट और अनिष्ट व्यवहार से उन्हें क्रोध नहीं आता था।
लेकिन उसी समय एक आकाशवाणी हुई, 'तुम्हारे ब्राह्मण गुरुदेव अत्यंत दयालु हैं और तुम उनकी निंदा करते हो गुरु से ईर्ष्या करने के कारण तुम्हें करोड़ों वर्षों तक नर्क भोगना होगा।'
शाप की बात सुन गुरुजी एक बार फिर दुःखी हो गए और उन्होंने शिवस्तुति आरंभ कर दी। भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, इसे जल्द ही शाप से मुक्ति मिल जाएगी।
उस व्यक्ति ने कई जन्मों के बाद जन्म लिया और मृत्यु हुई। अंत में उसने एक ब्रह्मण के घर जन्म लिया। पूर्व जन्म में जिसकी वह निंदा करता था लेकिन इस जन्म में उसके मुंह में सिर्फ राम नाम का जप रहता था। उसके पिता ने उसे पढ़ाया लेकिन उसकी पढ़ाई में मन नहीं लगता था।
एक दिन वह व्यक्ति भगवान राम का जप करते हुए। सुमेरू पर्वत की चोटी पर जा पहुंचा। वहां लोमश ऋषि एक पेड़ की छाया में बैठे थे। ब्राह्मण ने आदर से उन्हें प्रणाम किया। ऋषि से वो सगुण भक्ति निर्गुण भक्ति पर बहस करने लगा।
ऋषि क्रोधित हो गए, उन्होंने कहा, हे मूर्ख तू बहस करता है। तू इसी समय चांडाल पक्षी हो जा। फिर क्या, ब्राह्मण तुरंत कौआ हो गया, लेकिन कौआ होकर भी उसकी राम-नाम के प्रति भक्ति नहीं छूटी ! !

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