भगवान के अतिरिक्त कोई नही हैं
भगवानके अतिरिक्त
अपना कोई नहीं ! (द्रौपदी वस्त्रहरण)
द्युतमें (जुएमें) हारनेके पश्चात दुर्योधनने द्रौपदीको राज्यसभामें लानेका आदेश दिया । अत: दुःशासन उसे घसीटता हुआ राज्यसभामें लेकर आया । ऐसा न करने हेतु द्रौपदी निरंतर विनती कर रही थी; किंतु उनपर उसका कुछ भी परिणाम नहीं हुआ । द्रौपदीने सोचा, `मेरे पांच पति हैं, वे पूरे विश्वमें श्रेष्ठ हैं । वे निश्चय ही मेरी रक्षा करेंगे ।’ उसने युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव इन सबको सहायता करनेकी विनती की; किंतु कोई आगे नहीं आया । उसने सारे ज्येष्ठोंको भी आवाज दी; किंतु सभी जन गर्दन नीचे झुकाकर बैठे थे । अंतत: उसने श्रीकृष्णको आवाज दी । वह तुरंत दौडकर आए । उन्होंने द्रौपदीके वस्त्रोंकी आपूर्ति कर उसकी रक्षा की । उसने श्रीकृष्णसे पूछा, ``हे भगवन मैं संकटमें हूं, यह मालूम होते हुए भी तुम मेरी सहायता करने क्यों नहीं आए ?’’ उसपर श्रीकृष्णने कहा, ``तुम्हें तुम्हारे पतियोंपर विश्वास था, तुमने उन्हें बुलाया; तो मैं कैसे आ सकता हूं ? तुमने जब मुझे आवाज दी तो मैं तुरंत आ गया ।’’ द्रौपदीने श्रीकृष्णके चरणोंमें कृतज्ञता व्यक्त की ।
तात्पर्य : भगवानके अतिरिक्त अपना कोई नहीं होता । जिन्हें हम अपना कहते हैं, वे भी समय आनेपर हमारी सहायता नहीं करते । किसीको भी बार-बार आवाज देनेपर , न्यूनतम एक बार तो उस व्यक्तिको पीछे मुडकर देखना ही पडता है । भगवान एक बार आवाज लगानेसे ही आ जाते हैं; किंतु हम उन्हें छोडकर अन्य सभीको बुलाते रहते हैं । यदि हम निरंतर भगवानको आवाज लगाएं, तो क्या वह सदैव अपने पास नहीं रहेंगे ? तो अभीसे नामजप करेंगे ना
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